– उमंग सिंघार
(मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष)
26 जनवरी 2026 को भारत 77वें गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह दिन संविधान की सर्वोच्चता और लोकतांत्रिक मूल्यों का उत्सव है। लेकिन, इस अवसर पर आदिवासी समुदाय के अधिकारों का जिक्र अनिवार्य हो जाता है। संविधान ने आदिवासियों को पांचवीं और छठी अनुसूची के माध्यम से विशेष संरक्षण प्रदान किया, फिर भी सरकारें इन अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में असफल रहीं। वन अधिकार अधिनियम-2006 (FRA) और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम-1996 (PESA) जैसे कानूनों के बावजूद, आदिवासी अपनी जमीन, जंगल और संसाधनों से वंचित हैं। अब समय है कि ‘आदिवासी विकास परिषद’ जैसे संगठन आगे आएं और इन्हें संवैधानिक ताकत प्रदान करें।
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने आदिवासियों की विशिष्ट स्थिति को समझा था। अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में राज्यपाल को विशेष शक्तियां दी गईं, ताकि आदिवासी संस्कृति, भूमि और स्वशासन सुरक्षित रहे। छठी अनुसूची ने पूर्वोत्तर राज्यों में स्वायत्त जिला परिषदों का प्रावधान किया। FRA ने 2006 में आदिवासियों को वन भूमि पर स्वामित्व का अधिकार दिया, जिसमें 40 लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन शामिल है। PESA ने ग्रामीण स्थानीय शासन में आदिवासियों को निर्णय लेने का हक दिया। लेकिन, हकीकत अलग है। केंद्र और राज्य सरकारें खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और विकास के नाम पर इन अधिकारों का उल्लंघन कर रही हैं।
2025 तक FRA के तहत मात्र 5% दावे ही स्वीकृत हुए, जबकि 45 लाख से अधिक दावे लंबित हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास के नाम पर विस्थापन जारी है। हाल के सर्वे बताते हैं कि 70% आदिवासी परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं, बेरोजगारी दर 40% से अधिक है। कोविड-19 महामारी ने उनकी स्थिति और बदतर कर दी, जहां स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की कमी ने हजारों जानें लीं। सरकारें ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा तो देती हैं, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा विकास ठप है। नर्मदा घाटी, हसदेव अरण्य और नीलगिरी जैसे क्षेत्रों में कॉर्पोरेट हितों ने आदिवासी अधिकारों को कुचल दिया। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसलों ने भी FRA के गलत क्रियान्वयन पर चिंता जताई है।
इस विडंबना का कारण सरकारी उदासीनता और नौकरशाही है। अधिकार तो कागजों पर हैं, लेकिन जागरूकता, क्रियान्वयन और निगरानी की कमी है। आदिवासी अशिक्षित और संगठित न होने के कारण शोषित हो रहे हैं। यहीं पर आदिवासी विकास परिषद जैसे संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। ये संगठन संवैधानिक प्रावधानों की जागरूकता फैला सकते हैं, कानूनी सहायता प्रदान कर सकते हैं और नीति निर्माण में भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। परिषदें स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण शिविर चला सकती हैं, जहां FRA और PESA के तहत दावे दाखिल करने की ट्रेनिंग दी जाए। वे ग्राम सभाओं को सशक्त बनाकर विकास परियोजनाओं पर वीटो पावर का उपयोग सिखा सकती हैं।
77वें गणतंत्र दिवस पर सरकार से अपील है कि FRA के सभी लंबित दावों का निपटारा करे, PESA को सख्ती से लागू करे और आदिवासी बजट में पारदर्शिता लाए। लेकिन, वास्तविक बदलाव संगठनों से आएगा। आदिवासी विकास परिषद को आगे आना होगा। जिसके लिए जागरूकता अभियान चलाएं, कानूनी सलाहकार स्थापित करें और अपनी ताकत का दबाव बनाएं। संविधान की आत्मा तभी जीवंत होगी जब उसके सबसे कमजोर हितधारक सशक्त होंगे। आदिवासी भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं; उनके बिना गणतंत्र अधूरा है। आइए, इस गणतंत्र दिवस पर संकल्प लें कि संवैधानिक अधिकारों को ताकत देकर समावेशी भारत बनाएंगें।
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