आदिवासियों के लिए असुरक्षित क्यों बन गया मध्य प्रदेश ?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2024 की रिपोर्ट ने एक बार फिर मध्य प्रदेश सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें सुशासन, सुरक्षा और संवेदनशील प्रशासन की बातें की जाती हैं। देशभर में आदिवासियों के खिलाफ दर्ज कुल अपराधों में से 31.75 प्रतिशत मामले अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज होना बेहद गंभीर और शर्मनाक स्थिति है। मध्य प्रदेश पिछले 3-4 सालो से इस भयावह अपराध की श्रेणी में शीर्ष राज्यों में से एक रहा है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस असफल व्यवस्था का आईना है, जिसमें आदिवासी समाज खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? मध्य प्रदेश आदिवासी बहुल राज्य है। यहां आदिवासी समाज ने हमेशा जल, जंगल और जमीन की रक्षा की है। लेकिन भाजपा सरकार के लंबे शासनकाल में यही समाज सबसे ज्यादा शोषण, हिंसा और अन्याय का शिकार बन गया है। सरकार के मंचों पर आदिवासी सम्मान की बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी सुरक्षा और अधिकार दोनों लगातार कमजोर हो रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि आदिवासी महिलाओं के खिलाफ अपराधों की स्थिति और भी भयावह है।  2024 में आदिवासी महिलाएं और बच्चों से रेप के 358 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल मामलों का 28.23% प्रतिशत है। यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जब एक राज्य की बेटियां, वह भी समाज के सबसे कमजोर वर्ग से आने वाली महिलाएं, सबसे ज्यादा हिंसा का सामना कर रही हों, तो सरकार के सारे दावे खोखले साबित हो जाते हैं। आदिवासी बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी बढ़ोतरी हुई है। पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं। अपहरण, जबरन शादी और यौन अपराधों की घटनाएं यह साबित करती हैं कि अपराधियों के मन में कानून का कोई भय नहीं बचा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे दुखद बात यह है कि इन आंकड़ों के पीछे दर्दनाक मानवीय कहानियां छिपी हैं। इंदौर में एक आदिवासी युवक से सार्वजनिक रूप से जूते के फीते बंधवाना केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं था, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की गरिमा पर हमला था। सिंगरौली में अवैध रेत उत्खनन का विरोध करने वाले आदिवासी किसान इंद्रपाल अगरिया को ट्रैक्टर से कुचल दिया गया। यह घटना बताती है कि प्रदेश में माफिया और अपराधियों का हौसला कितना बढ़ चुका है। जो आदिवासी अपनी जमीन और अधिकार बचाने की कोशिश करता है, उसे कुचल दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि जातीय हिंसा से जूझ रहे मणिपुर जैसे राज्य के बराबर मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर अपराध हो रहे हैं, जबकि यहां कोई बड़ा दंगा या संघर्ष नहीं है। फिर भी मध्य प्रदेश अपराध के आंकड़ों में उसी स्तर पर पहुंच गया है। इसका मतलब साफ है कि राज्य में व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास गृह विभाग भी है। वे लगातार विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठकों में दिखाई देते हैं। कभी स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा, कभी शिक्षा विभाग की समीक्षा, कभी नगरीय प्रशासन की समीक्षा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि गृह विभाग की समीक्षा कौन करेगा? जब आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में मध्य प्रदेश देश में नंबर-1 बन चुका है, तब मुख्यमंत्री को जवाब देना चाहिए कि आखिर उनकी सरकार अपराध रोकने में क्यों असफल रही? सरकार अक्सर यह कहकर बचने की कोशिश करती है कि मामले दर्ज होना जागरूकता का संकेत है। लेकिन यदि जागरूकता ही कारण होती, तो अपराधों में लगातार बढ़ोतरी क्यों होती? क्यों आदिवासी महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही हैं? क्यों आदिवासी किसानों को अपनी जमीन बचाने के लिए जान गंवानी पड़ रही है? क्यों आदिवासी युवाओं को सार्वजनिक अपमान झेलना पड़ रहा है? आज जरूरत केवल आंकड़ों पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। आदिवासी समाज को सुरक्षा, सम्मान और न्याय चाहिए। उनकी जमीन, जंगल और अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। अपराधियों और माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना बंद होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा सरकार इन मूल मुद्दों पर गंभीर दिखाई नहीं देती। कांग्रेस लगातार आदिवासी समाज की आवाज उठाती रही है और आगे भी उठाती रहेगी। नेता प्रतिपक्ष के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि आदिवासियों के सम्मान और सुरक्षा के सवाल को मजबूती से विधानसभा और जनता के बीच रखूं।

आदिवासियों के लिए असुरक्षित क्यों बन गया मध्य प्रदेश? – उमंग सिंघार (नेता प्रतिपक्ष, मध्यप्रदेश विधानसभा) नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2024 की रिपोर्ट ने एक बार फिर मध्य प्रदेश सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें सुशासन, सुरक्षा और संवेदनशील प्रशासन की बातें की जाती हैं। देशभर में आदिवासियों के खिलाफ दर्ज कुल अपराधों में से 31.75 प्रतिशत मामले अकेले मध्य प्रदेश में दर्ज होना बेहद गंभीर और शर्मनाक स्थिति है। मध्य प्रदेश पिछले 3-4 सालो से इस भयावह अपराध की श्रेणी में शीर्ष राज्यों में से एक रहा है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उस असफल व्यवस्था का आईना है, जिसमें आदिवासी समाज खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? मध्य प्रदेश आदिवासी बहुल राज्य है। यहां आदिवासी समाज ने हमेशा जल, जंगल और जमीन की रक्षा की है। लेकिन भाजपा सरकार के लंबे शासनकाल में यही समाज सबसे ज्यादा शोषण, हिंसा और अन्याय का शिकार बन गया है। सरकार के मंचों पर आदिवासी सम्मान की बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी सुरक्षा और अधिकार दोनों लगातार कमजोर हो रहे हैं। एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि आदिवासी महिलाओं के खिलाफ अपराधों की स्थिति और भी भयावह है।  2024 में आदिवासी महिलाएं और बच्चों से रेप के 358 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल मामलों का 28.23% प्रतिशत है। यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जब एक राज्य की बेटियां, वह भी समाज के सबसे कमजोर वर्ग से आने वाली महिलाएं, सबसे ज्यादा हिंसा का सामना कर रही हों, तो सरकार के सारे दावे खोखले साबित हो जाते हैं। आदिवासी बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी बढ़ोतरी हुई है। पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि बच्चे भी सुरक्षित नहीं हैं। अपहरण, जबरन शादी और यौन अपराधों की घटनाएं यह साबित करती हैं कि अपराधियों के मन में कानून का कोई भय नहीं बचा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे दुखद बात यह है कि इन आंकड़ों के पीछे दर्दनाक मानवीय कहानियां छिपी हैं। इंदौर में एक आदिवासी युवक से सार्वजनिक रूप से जूते के फीते बंधवाना केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं था, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की गरिमा पर हमला था। सिंगरौली में अवैध रेत उत्खनन का विरोध करने वाले आदिवासी किसान इंद्रपाल अगरिया को ट्रैक्टर से कुचल दिया गया। यह घटना बताती है कि प्रदेश में माफिया और अपराधियों का हौसला कितना बढ़ चुका है। जो आदिवासी अपनी जमीन और अधिकार बचाने की कोशिश करता है, उसे कुचल दिया जाता है। हैरानी की बात यह है कि जातीय हिंसा से जूझ रहे मणिपुर जैसे राज्य के बराबर मध्य प्रदेश में आदिवासियों पर अपराध हो रहे हैं, जबकि यहां कोई बड़ा दंगा या संघर्ष नहीं है। फिर भी मध्य प्रदेश अपराध के आंकड़ों में उसी स्तर पर पहुंच गया है। इसका मतलब साफ है कि राज्य में व्यवस्था पूरी तरह विफल हो चुकी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पास गृह विभाग भी है। वे लगातार विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठकों में दिखाई देते हैं। कभी स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा, कभी शिक्षा विभाग की समीक्षा, कभी नगरीय प्रशासन की समीक्षा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि गृह विभाग की समीक्षा कौन करेगा? जब आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में मध्य प्रदेश देश में नंबर-1 बन चुका है, तब मुख्यमंत्री को जवाब देना चाहिए कि आखिर उनकी सरकार अपराध रोकने में क्यों असफल रही? सरकार अक्सर यह कहकर बचने की कोशिश करती है कि मामले दर्ज होना जागरूकता का संकेत है। लेकिन यदि जागरूकता ही कारण होती, तो अपराधों में लगातार बढ़ोतरी क्यों होती? क्यों आदिवासी महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही हैं? क्यों आदिवासी किसानों को अपनी जमीन बचाने के लिए जान गंवानी पड़ रही है? क्यों आदिवासी युवाओं को सार्वजनिक अपमान झेलना पड़ रहा है? आज जरूरत केवल आंकड़ों पर चर्चा करने की नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। आदिवासी समाज को सुरक्षा, सम्मान और न्याय चाहिए। उनकी जमीन, जंगल और अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। अपराधियों और माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना बंद होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भाजपा सरकार इन मूल मुद्दों पर गंभीर दिखाई नहीं देती। कांग्रेस लगातार आदिवासी समाज की आवाज उठाती रही है और आगे भी उठाती रहेगी। नेता प्रतिपक्ष के रूप में मेरी जिम्मेदारी है कि आदिवासियों के सम्मान और सुरक्षा के सवाल को मजबूती से विधानसभा और जनता के बीच रखूं।

लेखक- उमंग सिंघार (नेता प्रतिपक्ष, मध्यप्रदेश विधानसभा)