अधिकारों के नाम पर अन्याय : आदिवासी समाज के टूटते भरोसे मानव अधिकार दिवस और आदिवासी समाज

अधिकारों के नाम पर अन्याय : आदिवासी समाज के टूटते भरोसे मानव अधिकार दिवस और आदिवासी समाज

जय भीम जय जोहार | प्रशांत | मप्र आदिवासी विकास परिषद् भोपाल

10 दिसंबर, मानव अधिकार दिवस, देश और दुनिया में मनाया जाता है, लेकिन आदिवासी अंचलो में, सुदूर गावों की दलित बस्तियों में हमें इसका वास्तविक रूप दिखाई नहीं देता। वहाँ तो रोज़ मानव अधिकारों का गला घोंटा जा रहा है। ऐसे में इसे केवल एक दिवस के रूप में मना लेना, एक औपचारिकता सा लगता है।

दलितों और आदिवासियों की स्थिति से आज पूरा देश परिचित है। उनके मानव अधिकारों की जगह मानवता का खुलेआम कत्ल हो रहा है। निर्दोष आदिवासी भी मारे जा रहे हैं और इन अत्याचारों के खिलाफ जो आदिवासी सशस्त्र संघर्ष में शामिल हैं, उनकी जान भी जा रही है। गोली चाहे किसी की भी हो, मरता तो इंसान ही, आदिवासी ही है। हमने छह महीने के बच्चों पर गोलियाँ चलते देखी हैं। पूरे‑पूरे गाँव उजड़ते देखे हैं।

महिलाओं और माताओं का जीवन असुरक्षित है। जब गाँव के लोगों को ये भी नहीं पता कि मानव अधिकार दिवस क्या होता है, तो वे इसे कैसे मनाएँ? जब इन अत्याचारो के ख़िलाफ़ आवाज़े उठती है, हिंसा का रूप लेती है, तो उन्हें मुजरिम बनाकर जेलों में डाला जाता है, मतलब दोहरा अत्याचार, कानून के खिलाफ जाना गैर कानूनी है और गैर संवैधानिक भी, यह हम सब मानते है लेकिन इस बात पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार क्या कभी किसी ने किया कि भोला भाला जंगलो में रहने वाला,ग्रामीण आदिवासी क्यों हिंसक रास्तो में चलने को मजबूर होता है। इसका जवाब आप सभी के पास है लेकिन आप सभी अपने अपने सुविधा के अनुसार चुप्पी साध लेते है, क्योंकि मानव अधिकारों के नाटक के नीचे हमेशा दलित आदिवासी ही रौंधा जाता है।

सरकारे अपने हिसाब से हर दिवस मनाती है चाहे मानव अधिकार दिवस हो या कोई और दिवस। यह उनका प्रचार हो सकता है। लेकिन ज़मीन पर रहने वाले आदिवासियों, दलितों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए यह दिवस कई बार काले दिवस जैसा महसूस होता है, क्योंकि हम रोज़ हिंसा, हत्याएँ और अत्याचार देख रहे हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से इस दिन को मनाने का आधार नहीं देखता, क्योंकि हम खुद पीड़ित हैं। अगर हम सच में इंसान माने जाते, तो हमारे साथ इतनी बर्बरता क्यों होती?

दलित आदिवासी समाज के मानव अधिकार सबसे ज्यादा संकट में रहे है इसका स्पस्ट उदाहरण NCRB की हाल ही में आई रिपोर्ट से मिलता है, हाल के वर्षों के NCRB के जातिवार विचाराधीन कैदी डेटा से पता चलता है कि भारत में SC और ST समुदाय के लोग जेल में अपनी मुकदमे की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही अपेक्षाकृत अधिक समय विचाराधीन कैदी के रूप में बिताते हैं। SC विचाराधीन कैदियों की हिस्सेदारी लगभग 20–22% और ST विचाराधीन कैदियों की लगभग 10% है, जिससे कुल मिलाकर ये समुदाय कुल विचाराधीन कैदियों का लगभग 30% या उससे थोड़ा अधिक हिस्सा बनाते हैं। यह उनकी वास्तविक जनसंख्या हिस्सेदारी (SC ~16–17%, ST ~8–9%) से कहीं अधिक है, जो न्याय तंत्र में सामाजिक असमानता और संभावित भेदभाव को दर्शाता है।

इसके परिणामस्वरूप SC और ST समुदाय के लोग लंबी अवधि तक विचाराधीन कैदी रह जाते हैं, जिससे उनकी आजीविका, परिवार और सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। यह तथ्य केवल सांख्यिकी नहीं, बल्कि हमारी न्यायिक प्रणाली में कमजोर वर्गों की सुरक्षा और समानता की आवश्यकता को रेखांकित करता है, और यह दर्शाता है कि सरकार और न्यायपालिका को इन समुदायों के लिए सुधारात्मक और संरक्षक उपाय सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। मानव अधिकार दिवस और इन अधिकारों का इतना खुल्ला मज़ाक सरकार और प्रशाषन मिलाकर उड़ा रहे है, ऐसे में, भारत जैसे देश में यह दिन कितना प्रासंगिक बचा है, यह विचारणीय है।

सरकार तो अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हर दिवस मनाएगी, 15 अगस्त, 26 जनवरी, आदिवासी दिवस, मानव अधिकार दिवस इत्यादि, लेकिन ज़मीन पर काम करने वाले लोग, गावो की दलित बस्तियों में रहने वाले दलित, उनकी महिलाएं, जंगलों में रहने वालेआदिवासी और सामाजिक कार्यकर्ता इसे उत्सव की तरह नहीं देख पाते। हमारे लिए इन इलाको की वर्तमान स्थिति मानव अधिकार दिवस को एक काला दिवस बना देती है।

आदिवासी अंचलो में महिलाओं की स्थिति अत्यंत चुनौतीपूर्ण है, बहुत‑सी महिलाएँ पर्यावरण, मानव अधिकार और आदिवासी समाज के लिए काम कर रही हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें जेल, धमकी और दमन का सामना करना पड़ता है। आज अनेक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्त्ता, महिलाएँ आज जेल में हैं। जेल से बाहर आने के बाद भी उनका जीवन आसान नहीं होता। वे निरंतर दबाव और खतरे में रहते हैं।जंगलों में रहने वाली महिलाएँ अपने पति, बच्चों और घर को बचाने के लिए पुलिस की मार सहती, हर प्रकार का शोषण सहती हैं। वे भागती नहीं हैं, बल्कि डंडे अपने शरीर पर झेलती हैं ताकि घर और जीवन सुरक्षित रह सके।

हम सरकार की सरेंडर नीति देख रहे है, यह नीति आकड़ो और काग़ज़ों में बड़ी सफल दिखाई देती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अलग है। बहुत बार निर्दोष ग्रामीणों को नक्सली बताकर सरेंडर कराया जाता है। केवल इसलिए कि उन्होंने कभी नक्सली को पानी दे दिया, रास्ता दिखा दिया या जंगल में साथ रहे, उन्हें नक्सली मान लिया जाता है। यह सरासर गलत है। यह मानवता के खिलाफ है, आदिवासी अपना मानव धर्म निभाता है और शिकार बन जाता है अगर यही पैमाना है, तो फिर पुलिस भी गाँव वालों की मदद से ही जंगलों में चलती है, खाना लेती है तो क्या वह भी अपराध हुआ?

जो वास्तविक रूप से हथियार उठाकर संघर्ष में थे और अब स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर रहे हैं, यह स्वागतयोग्य है, हम सब इसका सम्मान करते है, लेकिन निर्दोष आदिवासियों को जबरन इसमें शामिल करना मानव अधिकारों का खुला उल्लंघन है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे समर्पण अभियान और नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान बार‑बार यह देखने को मिलता है कि मुठभेड़ों में ग्रामीणआदिवासी समुदाय के निर्दोष लोग मारे जाते हैं, ऐसे लोग जिनका हथियारों या हिंसा से दूर‑दूर तक कोई संबंध नहीं होता। कई मामलों में फर्जी मुठभेड़ और फर्जी एनकाउंटर सामने आए हैं, जिन्हें केवल इसलिए अंजाम दिया गया ताकि प्रशासन अपने नक्सल विरोधी अभियानों की “सफलता” की रिपोर्ट बना सके। इस प्रक्रिया में निर्दोष आदिवासियों की हत्या और आदिवासी महिलाओं पर जांच के नाम पर शारीरिक व यौन अत्याचार जैसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन होते रहे हैं, जिनका शिकार आदिवासी समाज दशकों से बनता आ रहा है। ऐसी स्थिति में मानव अधिकार दिवस मनाना आदिवासियों पर हो रहे शोषण और हिंसा का मज़ाक बनाना जैसा प्रतीत होता है। यदि किसी आदिवासी को परिस्थितिवश या किसी कारण हथियार उठाने पर मजबूर भी होना पड़ा हो, तो भी प्रशासन का दायित्व है कि वह उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए, गिरफ्तारी करे और निर्णय लेने का अधिकार भारत के न्यायालय को दे, न कि मौके पर ही हथियार के बल पर उसकी जान ले ले। ऐसा करना न केवल मानवाधिकारों का बल्कि संवैधानिक अधिकारों का भी गंभीर उल्लंघन है, जिसे भारत के ग्रामीण और आदिवासी अंचल वर्षों से झेलते आ रहे हैं, जहाँ उनके जल जंगल, जमीन, उनकी अस्मिता और मानवीय गरिमा प्रतिदिन रौंधी जाती है और तो और उनका जीवन तक सुरक्षित नहीं हैं।

ऐसी परिस्थितियों में जब कानून मौजूद होते हुए भी न्याय नहीं मिलता, जब गोली से हर समस्या का समाधान ढूँढा जाता है, तो मानव अधिकार दिवस उत्सव नहीं रह जाता, एक मज़ाक बन जाता है , एक पाखंड बन जाता है और बन जाता है वह एक गंभीर और ग़मगीन मार्मिक सवाल, जिसके जवाब हम सभी को ढूंढने होंगे। यदि भारत में मानव अधिकारों की यह स्तिथि आपको विचलित परेशान और व्यथित नहीं कर देती, तो निःसंदेह आप अपनी मानवता खो चुके है।

इतने सारे जटिल गंभीर प्रश्नों के बाद अंत में हमारे पास सिर्फ एक प्रश्न बचता है, इन सारी परेशानियों का हल क्या है? इन सारी मुसीबत्ती मुसीबत से समाधान क्या है? और इन सब संकटो के समाधान के रूप मेअंत में हमें नजर आता है हमें हमारा संविधान। संविधान निर्माता डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था “कोई संविधान कितना भी अच्छा क्यों ना हो यदि उसे अमल में लाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो संविधान अंततः बुरा साबित होगा, और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो यदि उसे अमल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे तो संविधान अंततः अच्छा ही साबित होगा। इसका जीवंत प्रमाण हम आज देख रहे हैं, हमारा संविधान जो भारत के आदिवासियों के जल जंगल जमीन की सुरक्षा के पूरे अधिकार देता है, इसके बाद भी यदि वे जमीन पर लागू नहीं हो पा रहे हैं तो इसमें गलती भारत की शाषन व्यवस्था की है ना कि संविधान की, आवश्यकता इस बात की है कि हम बाबा साहेब और बिरसा मुंडा के सच्चे अनुयायी बने, शिक्षित होकर, संगठित होकर, संघर्ष करके भारत के संविधान और इसके अधिकारों को जमीन पर उतारे, किसी भी व्यवस्था को संविधान को लागु करने पर मजबूर कर दे। भगवान बिरसा मुंडा की क्रांति और बाबासाहेब की शिक्षा से ही हम भारत में दमित शोषित पीड़ित लोगों के मानव अधिकार सुनिश्चित कर पाएंगे, उन्हें उनके जीवन की गरिमा दिला पाएंगे, मानव अधिकार सुनिश्चित कर पाएंगे।

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