केंद्र की भाजपा सरकार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनका एजेंडा केवल बड़े उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट घरानों को लूट का लाइसेंस देना है। यह बजट -2026 किसानों, युवाओं, आदिवासियों और आम जनता की पुकार को पूरी तरह अनदेखा करता है। जहां एक तरफ टैक्स में छूट देकर अंबानी-अडानी जैसे पूंजीपतियों को अरबों की राहत दी गई, वहीं ज़मीन पर जी रही करोड़ों मेहनतकश आबादी को ठोकर मार दी गई। यह बजट न केवल आर्थिक अन्याय का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक न्याय की हत्या का भी।

सबसे पहले किसानों की बात करें।
देश का किसान पहले ही कर्ज के बोझ तले दबा है, आत्महत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा, लेकिन इस बजट में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी का कोई जिक्र तक नहीं। न कर्ज माफी की कोई ठोस योजना, न सिंचाई या बीज-सुविधाओं पर खर्च। बजट में कृषि के नाम पर कुछ छिटपुट घोषणाएं हैं, जो पुरानी योजनाओं का रंग-रोगन मात्र हैं। क्या यह वही सरकार है जो ‘अन्नदाता’ का राग अलापती है? किसान आंदोलनों में सैकड़ों जानें गईं, लेकिन बजट में उनकी एक फसल की कीमत भी सुनिश्चित नहीं। मध्य प्रदेश जैसे कृषि-प्रधान राज्य में जहां धान, गेहूं और सोयाबीन के किसान परेशान हैं, यह उपेक्षा घातक है। सरकार का फोकस एक्सपोर्ट पर है,
लेकिन किसान को आय दोगुनी करने का वादा झूठा साबित हो चुका।युवाओं के साथ भी यही अन्याय। बेरोजगारी दर रिकॉर्ड स्तर पर है, लाखों ग्रेजुएट बेरोजगार घूम रहे हैं, लेकिन बजट में रोजगार सृजन, शिक्षा या स्किल डेवलपमेंट पर कोई ठोस प्रावधान नहीं। नई जॉब स्कीम्स की घोषणा तो हुई, लेकिन फंडिंग कहां से आएगी? आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों पर खर्च तो बढ़ा, लेकिन ग्रामीण युवाओं के लिए पॉलिटेक्निक या आईटीआई पर कुछ नहीं। कौशल विकास का खानापूर्ति मात्र बजट आवंटन है, जो पहले से कम था। युवा वर्ग को लग रहा है कि सरकार उन्हें वोट बैंक के अलावा कुछ नहीं मानती। मध्य प्रदेश में जहां युवा पलायन कर रहे हैं, वहां यह मौन चुप्पी अपराध है।लेकिन सबसे घिनौना अपराध आदिवासियों के साथ हुआ है। आदिवासियों के लिए बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं—यह न केवल लापरवाही, बल्कि सुनियोजित साजिश है!
भारत की 10 करोड़ आदिवासी आबादी, जो जंगलों, खनिजों और जल-संपदा की रक्षा करती है, को भुला दिया गया। वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 के तहत लाखों दावे लंबित हैं, लेकिन बजट में FRA क्रियान्वयन के लिए एक पैसा भी नहीं। आदिवासी क्षेत्रों में पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर जीरो फोकस। मध्य प्रदेश, जो आदिवासी बहुल राज्य है बस्तर, मंडला, धार, झाबुआ और आलीराजपुर जैसे इलाकों में भूख, कुपोषण और सरकारी भ्रष्टाचार का बोलबाला है।
बजट में आदिवासी कल्याण के नाम पर ट्राइफेड या एकलव्य स्कूलों की पुरानी बातें दोहराई गईं। लेकिन, नया फंडिंग पैटर्न या विशेष पैकेज का अभाव। क्या सरकार भूल गई कि आदिवासी संविधान के अनुसूची-5 क्षेत्रों के संरक्षक हैं? खनन माफिया लूट रहे हैं, लेकिन आदिवासी को वन उत्पादों का उचित मूल्य या ‘पेसा’ (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया) को मजबूत करने का कोई प्लान नहीं। यह बजट आदिवासियों को ‘वन्यजीव’ मानकर उपेक्षित करता है, उनके हक छीनकर कॉर्पोरेट को सौंप देता है। हम मांग करते हैं कि आदिवासी उप-योजना में 8.6% जीडीपी का हिस्सा सुनिश्चित हो, FRA दावों का तत्काल निपटारा हो और विशेष आदिवासी विकास पैकेज बने। अन्यथा यह बजट आदिवासी विद्रोह को न्योता देगा! यह बजट महंगाई रोकने में भी विफल है। जीएसटी में छूट अमीरों को, लेकिन सब्जी-दाल पर बोझ आम आदमी पर। स्वास्थ्य बजट में वृद्धि हुई।
लेकिन, आयुष्मान कार्ड की हकीकत जानी-पहचानी है। महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीबों के लिए भी घोषणाएं खोखली है। कुल मिलाकर, यह बजट ‘विकसित भारत’ का ढोंग है, जो असली भारत ग्रामीण, किसान, युवा और आदिवासी को नजरअंदाज करता है। भाजपा सरकार को जवाब देना चाहिए कि क्या यह ‘सबका साथ, सबका विकास’ है या ‘अमीरों का साथ, गरीबों का विनाश’? कांग्रेस पार्टी इस जनविरोधी बजट के खिलाफ सड़क से सदन तक संघर्ष करेगी। समय आ गया है कि जनता जागे और इस पूंजीवादी बजट को खारिज करे!
लेखक
मध्य प्रदेश आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष
निरंतर आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों को मजबूती और संवेदनशीलता के साथ उठाते हैं।
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