साल 2025 मध्यप्रदेश के आदिवासियों का संघर्ष से भरा साल

 उमंग सिंघार (नेता प्रतिपक्ष, मध्यप्रदेश विधानसभा)

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साल 2025 मध्यप्रदेश के आदिवासी समाज को कई कड़वे अनुभव और दुखद यादें देकर बीत गया। क्योंकि, प्रदेश के आदिवासियों के लिए यह साल पीड़ा, संघर्ष और प्रतिरोध का दौर साबित हुआ। खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और तथाकथित ‘विकास परियोजनाओं’ की आड़ में जिस तरह से आदिवासी इलाकों की जमीन छीनी गई,

वह न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन था, बल्कि सामाजिक अन्याय का प्रतीक भी बना। प्रदेश के दक्षिणी, पूर्वी और मध्य हिस्सों विशेषकर झाबुआ, डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, शहडोल, अलीराजपुर और छिंदवाड़ा जिलों में 2025 के दौरान कई आदिवासी समूहों को खनन परियोजनाओं के कारण अपने पारंपरिक आवासों से उजड़ने का खतरा झेलना पड़ा।

ऐसा सबसे चर्चित मामला बालाघाट के बैहर क्षेत्र का रहा, जहां निजी कंपनियों को मैंगनीज और लौह अयस्क के लिए खनन के पट्टे दिए गए। यहां तक कि ग्राम सभाओं की अनुमति लिए बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, जिससे स्थानीय गोंड और बैगा समुदायों में भारी आक्रोश फूट पड़ा।

जमीन और जंगल पर बाहरी नियंत्रण बढ़ा

 प्रदेश के जनजातीय इलाकों में भूमि अधिकार की लड़ाई नई नहीं है, पर 2025 में यह संघर्ष और तीखा हो गया। आदिवासी अधिकार कानून 2006 के तहत सामुदायिक वन अधिकार के दावे अब भी लंबित पड़े हैं। जबकि, दूसरी तरफ वन विभाग ने कई गांव में ‘संरक्षण’ के नाम पर लकड़ी कटाई और वन-प्रवेश प्रतिबंध बढ़ा दिए गए। इससे पारंपरिक आजीविका जैसेजंगल से महुआ, तेंदूपत्ता, साल बीज और गोंद इकट्ठा करने का काम बाधित हुआ और इसका खामियाजा आदिवासियों को उठाना पड़ा। राज्य के पश्चिमी इलाकों में पत्थर खदानों के विस्तार से भीआदिवासी मज़दूरों की जिंदगी प्रभावित हुई है। डिंडौरी और मंडला में खुले खनन स्थलों से जल स्रोत प्रदूषित हो गए, जिससे पीने के पानी और खेती दोनों पर संकट का साया छाया है। 

आदिवासी संस्कृति और पहचान पर हमला

खनिज उत्खनन और विस्थापन के साथ आदिवासी संस्कृति पर भी संकट गहराने लगा है। पारंपरिक नृत्य-गीत, पर्व और देव स्थानों पर किए गए निर्माण कार्य और सड़क परियोजनाओं ने सांस्कृतिक स्थलों को भी नुकसान पहुंचाया। कई जगह आदिवासी युवाओं को ‘मुख्यधारा में लाने‘ के नाम पर उनके पारंपरिक परिधान और भाषा को हतोत्साहित किया गया। यह न केवल सांस्कृतिक आत्मसात का मामला है, बल्कि पहचान मिटाने की कोशिश भी मानी जा रही है।

आदिवासी महिलाओं की दोहरी पीड़ा

बीते साल में महिलाओं ने विस्थापन और हिंसा दोनों से सबसे अधिक चोट खाई। भूमि विवादों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ीं। कई रिपोर्टों में सामने आया कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं को हिरासत में लेकर उन्हें डराया गया। फिर भी, बालाघाट, झाबुआ और अलीराजपुर की महिलाएं ग्राम सभाओं में सक्रिय रूप से नेतृत्व करती दिखीं, जो आदिवासी आंदोलन की नई दिशा का संकेत हैं।

आंदोलन और प्रतिरोध की चमक

इन तमाम यातनाओं के बीच आदिवासी संगठनों ने 2025 को ‘मुक्ति और अधिकार’ वर्ष के रूप में चिन्हित किया। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन‘ की तर्ज पर मंडला और डिंडौरी के इलाकों में ‘जल-जंगल-जमीन बचाओ संघर्ष समिति‘ ने अभियान चलाया। हजारों लोगों ने स्थानीय प्रशासन को ज्ञापन सौंपे और कई जिलों में गांव बंद आंदोलनों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया गया। भोपाल और इंदौर में आयोजित जन-सुनवाइयों में मानवाधिकार संगठनों ने सरकार से जवाब तलब भी किया।

सरकार की उदासीनता, न्याय का इंतजार

मध्यप्रदेश की सरकार ने खनन आधारित विकास‘ को प्राथमिकता दी और यह दावा किया कि आदिवासियों को मुआवजा और रोजगार मिलेगा। पर जमीनी हकीकत इसके उलट रही। अधिकांश विस्थापित परिवारों को न तो स्थायी आवास मिला, न रोजगार और न सही मुआवजा दिया गया। संविधान के पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में लागू होने वाले पेसा कानून‘ की भावना को भी नजरअंदाज किया गया। जबकि, ग्राम सभाओं को निर्णय का हिस्सा बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।

आदिवासी समाज आज अपने अस्तित्व की रक्षा के निर्णायक मोड़ पर है। यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संस्कृति और भविष्य की पीढ़ियों का भी सवाल है। 2025 ने दिखा दिया कि जब राज्य और बाजार मिलकर प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण साधने की कोशिश करते हैं, तो जनजातीय समाज का प्रतिरोध और भी सशक्त होता है। अगर प्रशासन वास्तव में संवैधानिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाएं तो 2026 आदिवासी आत्मनिर्भरता व पुनरुत्थान का वर्ष बन सकता है। पर, इसके लिए पहले न्याय और समानता की नींव रखनी होगी। यह तभी होगा, जब पूरा आदिवासी समाज एकजुट होगा और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेगा।

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