- उमंग सिंघार – नेता प्रतिपक्ष, मध्यप्रदेश विधानसभा
15 अगस्त तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और आज़ादी के इतिहास को याद करने का दिन है। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर भी देता है कि आज़ादी का अर्थ क्या है और क्या देश का हर नागरिक आज़ादी को बराबरी से महसूस कर पा रहा है ?

आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति नहीं है। आज़ादी का अर्थ है—हर इंसान को सम्मान के साथ जीने का अधिकार, अपने फैसले खुद लेने का अधिकार, अपनी जमीन और जंगल पर अधिकार, अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का अधिकार और बिना डर के अपनी आवाज उठाने का अधिकार।
जब हम आदिवासी समाज की बात करते हैं, तो आज़ादी का यह अर्थ सीधे उनके जंगल, जमीन और नदियों से जुड़ जाता है। आदिवासी के लिए जंगल, जमीन और जल यानी नदियों के बिना जिंदगी गुजारना मुश्किल है।
आदिवासी समाज ने देश की आज़ादी की लड़ाई में योगदान दिया। अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। बिरसा मुंडा, टंट्या मामा, रघुनाथ शाह, शंकर शाह और अनगिनत आदिवासी नायकों ने अन्याय और शोषण के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी। उनके लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था। उनके लिए आज़ादी का अर्थ था—अपनी पहचान, अपनी जमीन, अपनी संस्कृति, अपने जंगल को बचाना और प्राकृतिक संसाधनों के साथ जीना।
लेकिन आज़ादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी यह सवाल पूछना पड़ रहा है कि क्या आदिवासी समाज के साथ उसके अधिकारों के मामले में न्याय हो रहा है?
मध्यप्रदेश के कई आदिवासी इलाकों में गांव सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कहीं अस्पताल नहीं है, कहीं स्कूल दूर है, कहीं पीने का पानी समस्या है। अपने जंगल के साथ जो आदिवासी आत्मनिर्भर थे, वे रोजगार के लिए पलायन करने लगे हैं।
ऐसे में आज़ादी का अर्थ इतना नहीं हो सकता कि हमारे पास वोट देने का अधिकार है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब सबसे कमजोर व्यक्ति भी अपने अधिकारों को महसूस कर सके और उन्हें जी सके।
आदिवासी के लिए आज़ादी का पहला अर्थ है—जल, जंगल और जमीन पर उसका अधिकार।
जिस जंगल और जमीन ने पीढ़ियों से आदिवासी परिवारों को जीवन दिया, वह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जगह भर नहीं है। वह उनकी संस्कृति है, उनकी अर्थव्यवस्था है, उनकी पहचान है। जंगल आदिवासियों के पूर्वजों की विरासत है। जंगल से उनका रिश्ता केवल लकड़ी या जमीन का नहीं, बल्कि जीवन का रिश्ता है।
इसलिए विकास के नाम पर अगर आदिवासी को उसकी जमीन से बेदखल किया जाता है, उसकी सहमति और अधिकारों की अनदेखी की जाती है या उसके प्राकृतिक संसाधनों पर उसका नियंत्रण कमजोर किया जाता है, तो हमें यह पूछना होगा कि उस विकास में उसकी आज़ादी कहां है?
आज़ादी का दूसरा अर्थ है—अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य।
किसी आदिवासी मां-बाप के लिए आज़ादी का मतलब यह भी है कि उसका बच्चा अच्छी शिक्षा पा सके, समय पर इलाज मिल सके, कुपोषण से मुक्त रहे और उसे रोजगार के लिए अपना गांव छोड़ने की मजबूरी न हो।
किसी आदिवासी गांव में बीमारी फैलने के बाद भी अगर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था समय पर नहीं पहुंचती, अगर बच्चों की मौत के बाद प्रशासन जागता है, तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता नहीं है। यह उस परिवार के जीने के अधिकार की उपेक्षा है।
आज़ादी का तीसरा अर्थ है—सम्मान।
आदिवासी समाज को किसी की दया नहीं चाहिए। वह सरकार से कुछ नहीं मांगता। वह संविधान में मिले अपने अधिकारों के सम्मान की मांग करता है। उसे केवल अपने अधिकार चाहिए।
आदिवासी समाज को विकास की मुख्यधारा में लाने की बात होती है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि आदिवासी समाज को किसी दूसरी धारा में मिलाना नहीं है। उसकी अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा और जीवन-पद्धति है। विकास ऐसा होना चाहिए, जिसमें उसकी पहचान सुरक्षित रहे और उसके फैसलों में उसकी भागीदारी हो।
आज़ादी का चौथा अर्थ है—अपनी आवाज उठाने की आज़ादी।
आदिवासी गांवों की समस्याएं भोपाल या दिल्ली की फाइलों में नहीं, जंगलों में बसे गांवों की जमीन पर समझनी चाहिए। सरकार को उन लोगों की आवाज सुननी चाहिए।
मध्यप्रदेश की पहचान आदिवासी समाज के बिना अधूरी है। हमारे जंगल, हमारी नदियां, हमारी लोक परंपराएं और हमारी संस्कृति में आदिवासी समाज की गहरी भागीदारी है। हम प्रयास कर रहे हैं कि आज़ादी केवल शहरों तक सीमित न रहे। यह पहाड़ों पर बसे गांवों तक पहुंचे। यह जंगल के बीच रहने वाले परिवारों तक पहुंचे। यह उस मां तक पहुंचे, जो अपने बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल का रास्ता तलाशती है। यह उस युवा तक पहुंचे, जो रोजगार के लिए अपना गांव छोड़ने को मजबूर है।
जब तक आदिवासी परिवार अपने अधिकारों के साथ सम्मानपूर्वक नहीं जी पाएगा, तब तक हमारी आज़ादी की यात्रा पूरी नहीं मानी जा सकती।
आज़ादी का असली अर्थ यही है—सत्ता से नहीं, अन्याय से मुक्ति; डर से नहीं, अधिकार के साथ जीवन; और केवल झंडे के नीचे खड़े होने की नहीं, बल्कि सिर उठाकर जीने की आज़ादी।
इस आज़ादी को मजबूत करना हम सबकी जिम्मेदारी है। और आदिवासी समाज के इस अधिकार की लड़ाई में हम उनके साथ खड़े हैं, खड़े रहेंगे।
